Wednesday, July 30, 2008

मौत का गीत जिन्दगी के नाम

कई बार मन में आता है कि जिन्दगी चंद हाथों में आकर इतनी सस्ती कैसे हो जाती है अपने घरों की सुरक्षित चारदीवारी में सोये हम जान भी नहीं पाते कि जिन्दगी किसी और के लिए कितनी बेजार हो सकती है .अफगान युद्ध के समय आए कुछ शब्द ,
जख्मो से रिसते लहू की मानिद
सिसक रही है कायनात
हवा में घुला है बारूद
दबे सहमे क़दमों की आहट
बियाबानो में नहीं करती है आवाज
घूम रहें हैं श्वान और शृगाल
डरावने रेगिस्तानों में
नहीं नजर आते कारवां
हैं जहरीले बादल
जो नहीं करेंगे बारिश पानी की
शिशु के लहू का कतरा
नहीं सकता बहला पिता के हाथों में पकड़ी बन्दूक को
हर लिबास सना है खून से
हर दामन पर है दाग अजनबियत का ।
कौन है पुकारता इस सुनसान राह से
जहाँ मीलों तक कोई नहीं :
हाथों में पकड़े विदेशी खिलोने
पेट में रखा विदेशी खाना
कमरों में सजा विदेशी आइना
भूल गया है अपना ही अक्स .......
कौन हो तुम ?
सदिओं से भीगती खुशबू को सोखता मौत का नाच.

2 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

पहली पोस्ट का स्वागत और बधाई !

siddheshwar singh said...

बधाई !