कई बार मन में आता है कि जिन्दगी चंद हाथों में आकर इतनी सस्ती कैसे हो जाती है अपने घरों की सुरक्षित चारदीवारी में सोये हम जान भी नहीं पाते कि जिन्दगी किसी और के लिए कितनी बेजार हो सकती है .अफगान युद्ध के समय आए कुछ शब्द ,
जख्मो से रिसते लहू की मानिद
सिसक रही है कायनात
हवा में घुला है बारूद
दबे सहमे क़दमों की आहट
बियाबानो में नहीं करती है आवाज
घूम रहें हैं श्वान और शृगाल
डरावने रेगिस्तानों में
नहीं नजर आते कारवां
हैं जहरीले बादल
जो नहीं करेंगे बारिश पानी की
शिशु के लहू का कतरा
नहीं सकता बहला पिता के हाथों में पकड़ी बन्दूक को
हर लिबास सना है खून से
हर दामन पर है दाग अजनबियत का ।
कौन है पुकारता इस सुनसान राह से
जहाँ मीलों तक कोई नहीं :
हाथों में पकड़े विदेशी खिलोने
पेट में रखा विदेशी खाना
कमरों में सजा विदेशी आइना
भूल गया है अपना ही अक्स .......
कौन हो तुम ?
सदिओं से भीगती खुशबू को सोखता मौत का नाच.
Wednesday, July 30, 2008
Monday, July 28, 2008
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गीता शर्मा
गीता शर्मा
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